Monday, October 1, 2012

विश्वास....

पंखों पर विश्वास नहीं-
 तो पंछी कैसे उड़ पायेगा?
जागे विश्वास इक बार अगर तो-
दूर छितिज पा जाएगा.


दूर वो तारे दिन में नहीं हैं-
इस बात से, गर रूठ जायें तो
हर रात दिवाली इन्हीं से है
फिर कैसे संसार देख पायेगा?


पंखों पर विश्वास नहीं-
 तो पंछी कैसे उड़ पायेगा?


जंगल आज जो हरे - भरे हैं
जीवित  रंगों में रंगे हुए हैं.
पतझड़ की यादों में खो जायें गर तो-
फिर जीवन इनमे कौन पायेगा?


पंखों पर विश्वास नहीं-
तो पंछी कैसे उड़ पायेगा?
जागे विश्वास इक बार अगर तो-
दूर छितिज पा जाएगा..
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