Friday, January 11, 2013

THAT DAY..........


इस दिल की खिड़की  के पास-

 कुछ एहसास
अक्सर बैठ जाया करते हैं
ये सोचकर-
कि कोई तो जानी पहचानी याद
उनके सामने से होकर गुजरेगी.
और रूक कर उनसे बातें करेगी ........

कुछ  बेचैनियाँ-

नज़रों के दरवाजों को
बंद नहीं होने देतीं.
ये सोचकर कि -
कोई तो  नज़र
उनके सामने से होकर गुजरेगी
और रुख मिलाकर उनसे बातें करेगी......

होठों का खामोश सिलसिला भी

बदस्तूर जारी है
इस उम्मीद में कि -
किसी के लफ़्ज़ों का मेला
उन पर सजेगा.
और मुस्कुराहटों की बारिश होगी.

वो दिन कितना ख़ुशनसीब होगा

जिस दिन-
 ये दिल-नज़र- होंठ
 अपनी ख्वाहिशों में
समां सकेंगे..........................................